महाश्वेता देवी (14 जनवरी 1926 – 28 जुलाई 2016) एक भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका थीं। उन्हें 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी 1926 को ढाका (अब बांग्ला देश) में हुआ था । पिता मनीष घटक तथा माँ धारिणी देवी दोनों के ही माध्यम से महाश्वेता देवी ने लेखन तथा समाज चिन्ता के संस्कार पाए थे । महाश्वेता देवी की स्कूली शिक्षा ढाका में शुरू हुई लेकिन देश के विभाजन के बाद वह सपरिवार पश्चिमी बंगाल आ गईं । वहाँ उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय के शान्ति निकेतन से अंग्रेजी में बी.ए. ऑनर्स की परीक्षा पास की । एम.ए. अंग्रेजी के लिए वह कलकत्ता, यूनिवर्सिटी में आईं और वहीं से परीक्षा उत्तीर्ण की । वर्ष 1964 में उन्होंने विजयगढ़ कॉलेज में अध्यापन शुरू किया । यह कॉलेज कलकत्ता यूनिवर्सिटी द्वारा कामकाजी महिलाओं के लिए चलाया जा रहा था । अध्यापन के साथ महाश्वेता देवी ने पत्रकारिता, रचनात्मक लेखन तथा आदिवासियों के जीवन का अध्ययन शुरू किया । वह दलित तथा स्त्रीविमर्श की दिशा में सक्रिय रहीं ।
महाश्वेता देवी ने बिहार, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का जीवन उनके बीच रहकर तथा उनमें घुल-मिलकर समझा । उनका ध्यान विशेष रूप से लोढ़ा तथा शबरा आदिवासियों की ओर अधिक रहा । वहाँ उन्होंने देखा कि वह जमींदारों के तथा व्यवस्था के भी दमन के शिकार हैं । 1965 में बिहार के पलामू क्षेत्र को देखते हुए उसे ‘आदिवासी भारत का दर्पण कहा । यहाँ उन्होंने देसी समाज को ऋणी तथा बंध रूप में विवश देखा । इन्हें स्त्रियों की दशा विशेष रूप से दयनीय लगी । उन्होंने महसूस किया कि उनके जीवन का स्तर मनुष्यों जैसा उपलब्ध नहीं है । वहाँ न शिक्षा है, न स्वास्थ्य सेवा । न ही कोई सड़क रास्ता है, न आमदनी का कोई जरिया । उनके लिए यह हृदय विदारक था । महाश्वेता देवी ने इन अनुभवों को अपने लेखन के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया ।
मृत्यु के दो महीने पहले से महाश्वेता देवी कोलकाता में बेले व्यू क्लिनिक में इलाज चला और डॉक्टर्स उम्र के चलते होने वाली बीमारी को वे स्वीकार कर चुकी थीं। अनुसार उनके रक्त में इंफेक्शन था और किडनी फेल हो चुकी थी, जिसके कारण उनकी स्थिति पहले से काफी बिगड़ गई थी।
अपने जीवनकाल में ज्ञानपीठ, पद्मभूषण, साहित्य अकादमी एवं अन्य सम्माननीय पुरस्कार से सम्मानित महाश्वेता देवी ने अपने जीवन में कई अलग-अलग लेकिन महत्वपूर्ण किरदार निभाए। उन्होंने पत्रकारिता से लेकर लेखन, साहित्य, समाज सेवा एवं अन्य कई समाज हित से जुड़े किरदारों को बखूबी निभाया। महाश्वेता देवी ने अपने जीवन में न केवल बेहतरीन साहित्य का सृजन किया बल्कि समाज सेवा के विभिन्न पहलुओं को भी समर्पण के साथ जिया। उन्होंने आदिवासियों के हित में भी अपना अमूल्य सहयोग दिया।
साहित्यिक जीवन
महाश्वेता देवी का नाम ध्यान में आते ही उनकी कई-कई छवियां आंखों के सामने प्रकट हो जाती हैं। दरअसल उन्होंने मेहनत व ईमानदारी के बलबूते अपने व्यक्तित्व को निखारा। उन्होंने अपने को एक पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया।
महाश्वेता जी ने कम उम्र में लेखन का शुरू किया और विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं का महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपकी पहली उपन्यास, "नाती", 1957 में अपनी कृतियों में प्रकाशित किया गया था ‘झाँसी की रानी’ महाश्वेता देवी की प्रथम गद्य रचना है। जो 1956 में प्रकाशन में आया। स्वयं उन्हीं के शब्दों में, "इसको लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।" इस पुस्तक को महाश्वेता जी ने कलकत्ता में बैठकर नहीं बल्कि सागर, जबलपुर, पुणे, इंदौर, ललितपुर के जंगलों, झाँसी ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं यानी 1857-58 में इतिहास के मंच पर जो हुआ उस सबके साथ-साथ चलते हुए लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रांति के तमाम अग्रदूतों और यहाँ तक कि अंग्रेज अफसर तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। आप बताती हैं कि "पहले मेरी मूल विधा कविता थी, अब कहानी और उपन्यास है।" उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'नटी', 'मातृछवि ', 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां', माहेश्वर, ग्राम बांग्ला हैं। पिछले चालीस वर्षों में,उनकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित किये जा चुके हैं और सौ उपन्यासों के करीब (सभी बंगला भाषा में) प्रकाशित हो चुकी है।
उपन्यास 'अरण्येर अधिकार' का लेखन
अपने उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ (जंगल के दावेदार) में महाश्वेता देवी समाज में व्याप्त मानवीय शोषण और उसके विरुद्ध उबलते विद्रोह को उम्दा तरीके से रखांकित करती हैं। ‘अरण्येर अधिकार’ में उस बिरसा मुंडा की कथा है, जिसने सदी के मोड़ पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनजातीय विद्रोह का बिगुल बजाया। मुंडा जनजाति में समानता, न्याय और आजादी के आंदोलन का सूत्रपात बिरसा ने अंग्रेज़ों के खिलाफ किया था। ‘अरण्येर अधिकार’ आदिवासियों के सशक्त विद्रोह की महागाथा है जो मानवीय मूल्यों से सराबोर है। महाश्वेता ने मुख्य मुद्दे पर उँगली रखी है। मसलन बिरसा का विद्रोह सिर्फ अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध नहीं था, अपितु समकालीन सामंती व्यवस्था के विरुद्ध भी था। बिरसा मुंडा के इन पक्षों को सहेजकर साहित्य और इतिहास में प्रकाशित करने का श्रेय महाश्वेता को ही है। ‘अरण्येर अधिकार’ लिखने के पीछे की कहानी ये है कि 1974 में फिल्म निर्माता शांति चौधरी ने महाश्वेता से बिरसा मुंडा पर कुछ लिखकर देने को कहा। श्री चौधरी, बिरसा पर फिल्म बनाना चाहते थे। बिरसा पर लिखने के लिए महाश्वेता ने पहले तो कुमार सुरेश सिंह की किताब पढ़ी। फिर दक्षिण बिहार गईं, वहाँ के लोगों से मिलीं। कई तथ्य संग्रह किए। फिर लिखा ‘अरण्येर अधिकार’। 1979 में जब इस किताब पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो आदिवासियों ने जगह-जगह ढाक बजा-बजाकर गाया था- ‘हमें साहित्य अकादमी मिला है।’ तब मुंडा नाम से ही उनमें असीम गौरव बोध जगा था। जो मुंडा भूमिज नाम से सरकारी रेकार्ड में दर्ज थे, उन्होंने उपने को मुंडा नाम से दर्ज करने की प्रशासन से दरखास्त की थी। साहित्य अकादमी मिलने पर मुंडाओं ने महाश्वेता का अभिनंदन करने के लिए उन्हें अपने यहाँ (मेदिनीपुर में) बुलाया। 1979 की उस सभा में आदिवासी वक्ताओं ने कहा था- "मुख्यधारा ने हमें कभी स्वीकृति नहीं दी। हम इतिहास में नहीं थे।
